परिचय

“भारत की शिक्षा परंपरा विश्व मै प्राचीनतम और श्रेष्ठतम रही है| गुरुकुल, आश्रम विधापीठ एवं छोटे छोटे प्राथमिक विधालयों मै जीवन का सर्वतोमुखी विकास होता था और व्यक्ति का तथा राष्ट्र का जीवन सुख, समृध्धि, संस्कार एवं ज्ञान से परिपूर्ण होता था| विश्व भी उससे लाभान्वित होता था| इन विधाकेन्द्रो का आदर्श लेकर पुनरुत्थान विधापीठ कार्यरत होगा|”


पुनरुत्थान विधापीठ के तीन आधारभूत सूत्र रहेंगे|

१. विधापीठ पूर्णरूप से स्वायत रहेगा|

  • शिक्षा की स्वायत व्यवस्था इस देश की परंपरा रही है | इस परंपरा की पुन:प्रतिष्ठा करना शिक्षाक्षेत्र का महत्वपूर्ण दायित्व है|
  • स्वायतता से तात्पर्य क्या है और स्वायत शिक्षातंत्र कैसे चल सकता है इसे स्पष्ट करने का प्रयास विधापीठ करेगा|
  • विधापीठ शासनमान्यता से भी अधिक समाजमान्यता और वीदन्मान्यता से चलेगा|

२. विधापीठ शुद्ध भारतीय ज्ञानधारा के आधार पर चलेगा|

  • इस सूत्र के दो पहलू है|
  • विश्व के अन्यान्य देशो मे जो ज्ञानप्रवाह बह रहे हे उनको देशानुकूल बनाते हुए भारतीय ज्ञानधारा को पुष्ट करना |
  • प्राचीन ज्ञान को वर्तमान के लिए युगानुकूल स्वरूप प्रदान करना |

३. विधापीठ की सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था नि:शुल्क रहेगी|

  • भारतीय परंपरा मे अन्न, औषध और विधा कभी क्रयविक्रय के पदार्थ नहीं रहे| इस परंपरा को पुन:जीवित करते हुए इस विधापीठ मे अध्ययन करने वाले छात्रो से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा | फिर भी अन्यान्य व्यवस्थाओ के लिये धन की आवश्यकता तो रहेगी | अत:यह विधापीठ सवार्थ मे समाजपोषित होगा| विधापीठ मे सादगी, श्रमनिष्ठा एवं अर्थंसंयम का पक्ष महत्वपूर्ण रहेगा | सुविधा का ध्यान रखा जाएगा , वैभवविलासिता का नहीं|

शिक्षा का भारतीय प्रतिमान

विधापीठ का मुख्य कार्य है शिक्षा का भारतीय प्रतिमान विकसित करना |

    • इस प्रतिमान का शैक्षिक रूप है समग्र विकास | एकात्म मानव दर्शन इस प्रतिमान का वैचारिक आधार रहेगा और छात्र के व्यक्तित्व का समग्र विकास इसका शैक्षिक लक्ष्य रहेगा | समग्र विकास के दो पक्ष है|

१. सर्वांगी विकास अर्थात शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक और चैतसीक (जिसे सामान्य रूप से आध्यात्मिक कहते हे ) विकास| इसे उपनिषदों की भाषा मे अन्नमय, प्राणमय , मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश का विकास कहते हे|

२. परमेष्ठीगत विकास अर्थात व्यक्ति का परिवार, समाज, देश, विश्व, सम्पूर्ण सृष्टी और यह सृष्टी जिससे नि:सृत हुई हे और जिसकी अभिव्यक्ति है उस परमेष्ठी के संदर्भ मे विकास |

    • इस द्ष्टि से जो करणीय कार्य होगे वे प्रमुख रूप से इस प्रकार के होंगे………
      • वर्तमान मे पढ़ाये जाने वाले विषयो की समग्र विकास संकल्पना के अनुरूप पुनर्रचना होगी|
      • भारतीय पद्धति से अध्ययन, अनुसंधान एवं निरूपण होगा|
      • अध्ययन, अध्यापन पद्धतियो में भी परिवर्तन होगा | इसके साथ मूल्यांकन पद्धति भी बदलेगी |

३. समग्र विकास की द्ष्टि से वर्तमान मे पढ़ाये जाते हैं इसके अलावा और भी विषय, जैसे की गोविज्ञान, उधोग, संस्कृति एवं धर्म, भारतीय जीवनद्ष्टि, योग, संस्कृत, गृहशास्त्र, अधिजननशास्त्र, आदि विषयो को पढाने की व्यवस्था विधापीठ मे की जाएगी |

४. इन सब विषयो का भारतीय स्वरूप बनाने के लिए अध्ययन, अनुसंधान, पाठ्यक्रमो की रचना, पाठ्य पुस्तकों का निर्माण और शिक्षकों का प्रशिक्षण आदि सब किया जाएगा |

संक्षेप में शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान विकसित करने एवं उसे व्यवहार्य बनाने हेतु एक महान शैक्षिक़ प्रयास की आवश्यकता रहेगी |

विधापीठ के विभाग
विद्यापीठ की सम्भावनाये तो अनन्त है | परन्तु हर बडे कार्य का प्रारम्भ छोटा ही होता है| इस सूत्र के अनुसार विद्यापीठ मैं प्रारम्भ मैं चार विभाग कार्यरत है|

१. अध्ययन एवं आनुसन्धान विभाग

  • शिक्षा, संस्कृति, सभी सामाजिक सास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषयों मैं अध्ययन करना, अनुसन्धान करना, पठन पाठन सामग्री तैयार करना आदि कार्य इस विभाग मैं हो रहे है|

२. शिक्षकशिक्षा विभाग

  • जब इस देश का शिक्षक आचार्या बनकर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर छात्र का चरित्रनिर्माण और समाज को सुसंस्कृत बनाना अपना दायित्व मानेगा तब इस देश की शिक्षा स्वायत्त होगी| ऐसा शिक्षक निर्माण करने हेतु शिक्षकशिक्षा यह विद्यापीठ का दूसरा विभाग है|

३. परिवार शिक्षा विभाग

  • व्यक्ति के आचार, विचार, वयवहार, कौशल, जीवनविषयक, द्रष्टिकोण आदि सभी की शिक्षा जन्म से भी पूर्व गर्भावस्था से ही प्रारम्भ हो जाती है| संस्कार एवं चरित्रनिर्माण घर मैं ही होता है| साथ ही गृहास्थधर्म के सम्यक् पालन से ही समाज की धारणा होती है| अत: विद्यापीठ मैं परिवार शिक्षा का विभाग शूरु हो गया है|

४. लोकशिक्षा विभाग

  • समाज वर्तमान मैं शिक्षा विषयक अनेक भ्रान्त धारणाओं से ग्रस्त है| इस स्थिति मैं जो विनाश का मार्ग है उसे ही विकास का मार्ग मानता है| अत: समाज प्रबोधन करना विद्यापीठ का चौथा महत्वपूर्ण विभाग है|

ये चरों विभाग एकसाथ कार्यरत है|


प्रारंभीक कार्य

  •  देशभर के राष्ट्रीय शिक्षा मैं योगदान देने वाले १०१ विद्वज्जनों की एक विद्वत् परिषद का गठन जो अध्ययन अनुसन्धान आदि कार्यो का मार्गदर्शन एवं संचालन करेगी|
  • भारतीय ज्ञानधारा को संजोने वाले प्राचीन और अर्वाचीन ग्रंथो से युक्त एवं संचालन करेगी |
  • शोधसंस्थानों, पीएच.डी., एम.एड., एमफिल आदि शोधकार्य मैं रत छत्रों हेतु शोधविषयों की एक दीर्घ सूची का निर्माण, जिसे देशभर के विश्वविधायलयों एवं शोधविभागों को भेजा जायेगा और इन विषयों मैं शोधकार्य करने हेतु उन्हें निवेदन किया जायेगा|
  • विद्यापीठ स्वयं भी शोधप्रकल्प चलायेगा|
  • शिक्षकशिक्षा हेतु प्रारम्भ दो विषयों से होगा –
    • १. शिक्षक के आचार्या मैं रूपान्तरण की प्र्किया और आचार्या स्वविकास
    • २. राष्ट्रियता, राष्ट्रीय शिक्षा और राष्ट्रदर्शन
  • परिवारशिक्षा के अंतर्गत दो कार्य चल रहे है|
    • १. युवकयुवती एवं उनके मातापिता हेतु पाठ्यक्रम : वरवधूचयन एवं विवाहसंस्कार
    • २. परिवार व्यवस्था के दो पहलुओं को लेकर दो संदर्भग्रंथों का निर्माण एवं प्रकाशन
      • १. गृहअर्थशास्त्र
      • २. गृहस्थाश्रमी का समाजधर्म
  • लोकशिक्षा हेतु दो विषयों का चयन किया गया है|
    • १. मातापिता की बालक के रूप मैं भूमिका
    • २. धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा एवं शास्त्रशिक्षा : स्वरूप एवं व्याप्ति
  • पुनरुत्थान विद्यापीठ का प्रकाशन विभाग अभी अच्छी तरह से कार्यरत है| उसे और विकसित और प्रभावि बनाने का प्रयास चल रहा है|

विधापीठ शैक्षणीक मंच

  • भारत मैं आज शिक्षा के, विद्या के, विचारों के, ज्ञान के क्षेत्र में दो धराये बह रही हैं|
  • एक है पाश्चात्य धारा जिसे आधुनिक, वैश्विक, प्रगत कहा जाता है|
  • और दूसरी है भारतीय धारा जिसे पुरातन, एकदेशीय, परंपरागत कहा जाता है|
  • प्रथम धारा ऐसी है जो अनेकानेक अवरोधों के बावजूद संस्कार और संस्कृति को अपनाने हेतु जनमानस को अन्दर से प्रेरित करती है, परन्तु यह अधिकृत नहीं है और देश इससे नहीं चलता|
  • आवश्यकता इस भारतीय धारा को अधिकृतता प्रदान करने की है|
  • आज भी देशभर मैं ज्ञान और संस्कृति की इस धारा को जीवित रखने और पृष्ट बनाने का प्रयास अनेकानेक व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन कर रहे है|
  • पुनरुत्थान विद्यापीठ इन सभी प्र्यासों को विचार, कार्यक्रम, कार्य, अनुभव आदि के आदानप्रदान हेतु, परस्पर लाभान्वित होने और करने हेतु एक मंच प्रदान करेगा|
  • साथ ही ऐसे व्यक्ति, संस्था और संगठनों को परस्पर सुविधा, आवश्यकता एवं अनुकूलता के अनुसार अपने साथ जोडने का कार्य भी करेगा|
  • जो भारतीय है उसे भारत मैं अधिकृत बनाने हेतु और विश्व को उसका लाभ पाहुचने हेतु यह प्रयास होगा|